Monday, April 3, 2017

बचपन, तू बहुत याद आता है|

न ऊँचाइयों का डर था, न पानी से खतरा
न चिंता थी ज़माने की, न किसी बात का बुरा लगना
वो भागते हुए दादी की गोदी में छुप जाना

Monday, March 27, 2017

अधूरा सपना

फिर मांझी का साथ, मझधार में छूटा है
फिर एक तारा आसमान से टूटा है
यूँ तो कई सपने होते हैं दिल बहलाने को