Sunday, June 14, 2015

मजबूरियाँ

ये क्या है जो मुझे हो रहा
क्यूँ मेरी नींद मेरा चैन सब खो रहा
तेरे आने से मिली एक नयी ज़िंदगी
अब तो रोज़ करता हूँ तेरी बंदगी
मजबूरियाँ by Ankesh Kumar Shrivastava
क्यूँ तू इतने पास हो कर भी इतनी दूर है
क्यूँ हमारी ज़िंदगी इतनी मजबूर है
तेरी एक एक मुस्कुराहट को संजो कर रखता हूँ
जब भी तेरे साथ होता हूँ कुछ अलग ही होता हूँ
सुनता हूँ तेरी बक बक बिना थके
कहता हूँ तुझे हर कुछ बिना सोचे
क्यूँ चाहता है आख़िर दिल तुझे इतना
क्यूँ भूल नही पाता तुझे चाहू जितना
एक मुद्दत से जिसकी तलाश थी वो मिला भी तो कैसा
जैसे कोई खंजर सी चुभ रहा दिल में लग रहा ऐसा
अधूरे हम रह गए और रह गई हमारी कहानी अधूरी
तेरी यादों को ही दिल में बसा कर करनी है अब ये ज़िंदगी पूरी
गम के साएँ अब मंडरा रहे है चारो ओर
तू गया किसी रोज़ तो हो जाऊँगा चूर चूर
इस रास्ते की कोई मंज़िल नही
फिर भी चला जा रहा हूँ
ज़िंदगी की रौशिनी अब हो रही है कमज़ोर
फिर भी ना जाने किस आग में जला जा रहा हूँ...

No comments:

Post a Comment