Wednesday, January 7, 2015

क्यूँ ख़ुद से ख़फा है तू

क्यूँ ख़ुद से लड़ रहा तू क्यूँ ख़ुद से डर रहा तू
क्यूँ ख़ुद से ना कुछ कह सका
क्यूँ ख़ुद से रहता है तू ख़फा
क्या है वो बात जो तुझे है खा रही
क्यूँ ख़ुद से ख़फा है तू by Ankesh Kumar Shrivastava
किस चीज़ की है याद तुझे सता रही
क्यूँ बैठा है आज ऐसे मायूस तू
क्यूँ ना कुछ है बोलता
क्या राज़ है जिसको है तू समेटे हुए
क्यूँ इस जलती आग को है तू सीने से लपेटे हुए
ये कैसी तन्हाई है छाई तेरे चारो ओर
ये दिल में तेरे कैसी उठ रही है शोर
क्यूँ है ख़ुद को तू बेड़ियों से जकड़े हुए
क्यूँ ना ख़ुद को है करता आज़ाद तू
किसकी राह तक रही है ये तेरी आँखें
किसका है ये तुझको इंतज़ार
क्यूँ दूसरो के अक्स में है खुद को तलाशता तू
क्यूँ अपनी पहचान है खोता जा रहा
क्यूँ तेरे आँखों के कोरे में रह गई नामी
किस चीज़ की जीवन में तेरे रह गई कमी
क्यूँ दूसरों की आहट में खो रही तेरी आवाज़ है
क्यूँ ना बुझ पा रही तेरी ये अजब सी प्यास है
क्यूँ ख़ुद अपनी आँखों में देखता तू तकरार है
क्या है वो जिसकी तुझे आज भी दरकार है
क्यूँ आज ख़ुद से इस कदर जुड़ा है तू
क्यूँ आज ख़ुद से इस कदर ख़फा है तू....!!

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