Tuesday, December 1, 2015

पता नही

किस ओर जा रही थी ज़िंदगी
किस ओर चलने लगी
एक साँस थी जैसे ठहरी हुई

Wednesday, September 30, 2015

Sunday, June 14, 2015

मजबूरियाँ

ये क्या है जो मुझे हो रहा
क्यूँ मेरी नींद मेरा चैन सब खो रहा
तेरे आने से मिली एक नयी ज़िंदगी

Wednesday, April 29, 2015

तेरी आँखें

कुछ सुर्ख सी कुछ ख़ामोश सी
सब कुछ कह जाने को बेताब सी
कभी इधर कभी उधर कुछ तलाशती

Tuesday, February 24, 2015

एक शख्स...

एक शख्स था अंधेरो में जलता हुआ
खुद से डरा हुआ, ज़माने से लड़ा हुआ
थका सा, कुछ घबराया सा

Wednesday, January 7, 2015

क्यूँ ख़ुद से ख़फा है तू

क्यूँ ख़ुद से लड़ रहा तू क्यूँ ख़ुद से डर रहा तू
क्यूँ ख़ुद से ना कुछ कह सका
क्यूँ ख़ुद से रहता है तू ख़फा