Thursday, July 3, 2014

मेरी कहानी

ये है मेरी ज़िन्दगी
जिसे मानता हूँ ऊपर वाले की बंदगी
दोस्तों का साथ मुझे ऐसा मिला
जिनसे रहा न कभी मुझे कोई गिला
पर जब कभी हुई उनसे लड़ाई
Ankesh-Kumar-Shrivastava-in-Darjeeling
अगले दिन उन्होंने कंधे पर हाथ रख कर कहा,
सब ठीक हो जाएगा भाई
कभी लगा छोड़ गए साथी मुझे मझदार में
फिर मैंने सोचा अलग ही मज़ा है इस तकरार में
हाँ मिली कुछ मुश्किलें, कुछ तन्हाइयां इस ज़िन्दगी में
पर दिल को आता है सुकून इन दर्द भरे जामों को पीने में
कुछ बहारें भी दिखाई ज़िन्दगी ने इस आसमाँ के नीचे
पर छूट गई ख़ुशियाँ भागते-भागते इन ग़मों के पीछे
इस दिल ने भी किया था किसी से प्यार
पर जाने किस वजह से हो गई तकरार
अकेला चल रहा हूँ दुनिया की पनाहों में
ढूंढती रहती है मेरी नज़रें उसे ज़िन्दगी की राहों में
कुछ इस तरह से जुड़ गया है वो मेरी ज़िन्दगी से
चाह कर भी नहीं निकाल सकता हूँ उसकी खुशबू अपनी सांसो से
जी रहा हूँ ये ज़िन्दगी क्यों की है दोस्तों का साथ
जब भी पड़ता हूँ अकेला, थाम लेता हूँ उनका हाथ
सोचा था कर लूंगा सारी खुशियों को अपने आगोश में, भूल कर सारी तन्हाइयां
पर जैसे ये ज़िन्दगी तो बन गई है बहती नदियाँ
कभी सोचता हूँ थाम लूँ इन पलों को यहीं
खो जाऊं इन राहों में चलते-चलते कहीं!!

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